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दो कप चाय (Do Cup Chai)
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बारिश की बूँदें, खिड़की पे दस्तक
तेरी हँसी गूँजे, गली के नुक्कड़ तक
टपरी की बेंच पे, हम दोनों बैठे
अदरक की ख़ुशबू में, बातों में खो बैठे
तू फूँक मारे प्याली पे
मैं हारूँ तेरी लाली पे
दो कप चाय, और एक छतरी
तेरे संग लगे, हर शाम सुनहरी
भीगे से लम्हे, धीमी सी धड़कन
दो कप चाय, और तेरा अपनापन
कटिंग में आधा, आधा तेरे हिस्से
बन गए हैं अब तो, अपने भी किस्से
बिस्कुट डुबो के तू, नाराज़ सी हो जाए
टूटा जो प्याली में, तू फिर मुस्काए
तू फूँक मारे प्याली पे
मैं हारूँ तेरी लाली पे
दो कप चाय, और एक छतरी
तेरे संग लगे, हर शाम सुनहरी
भीगे से लम्हे, धीमी सी धड़कन
दो कप चाय, और तेरा अपनापन
बादल भी ठहरे, सुनने को बातें
काश ना ख़त्म हों, ये बरसातें
दो कप चाय, और एक छतरी
तेरे संग लगे, हर शाम सुनहरी
भीगे से लम्हे, धीमी सी धड़कन
दो कप चाय, और तेरा अपनापन